रविवार 11 2021



विश्वरत्न, भारतरत्न, समाजसुधारक, चिंतक, अर्थशास्त्री, राजनितिज्ञ, न्यायविद, वास्तुकार, शिल्पकार, संविधान निर्माता बाबासाहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी की 130वीं जयंती की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं ।

भारत के संविधान निर्माता, समाज सुधारक, दलितों के लिए आजीवन लड़ने वाले डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का जन्म दिवस 14 अप्रैल को मनाया जाता है । हर बार की तरह इस बार भी उनके जन्मदिवस के दिन अपने विचार और उनके आदर्शों के बारे में एक दूसरे से चर्चा करते हैं । इस बार उनके जन्म दिवस के दिन हम आपको एक रोचक कथा बताते हैं कि उनको अंबेडकर उपनाम कैसे मिला ? और बाबा साहब ने बौद्ध धर्म क्यों अपनाया ?

कैसे पड़ा उपनाम अंबेडकर  ?

दरअसल बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर का जन्म मध्यप्रदेश के महू गांव में हुआ था । 14 अप्रैल 1891 को पिता के  उपनाम में सतपाल लगा था (उपनाम मतलब सरनेम अथवा टाइटल) लेकिन उनके पिता मूल रूप से मराठी थे । गांव का उपनाम अंबाडवे था पिता ने अपना उपनाम बदल कर अंबाडवे कर लिया और यही बाद में अंबेडकर बन गया । 

बाबा साहेब का जन्म हिंदू धर्म के महार जाति में हुआ था और उस वक्त की मान्यता के अनुसार महार जाति को लोग अछूत और निचली जाति के मानते थे । और सिर्फ जाति के कारण प्रतिभाशाली होने के बावजूद बाबासाहेब को हमेशा जातिगत भेदभाव, छुआछूत का सामना करना पड़ा । और इस कुप्रथा ने बाबासाहेब को डॉक्टर भीमराव अंबेडकर बना दिया । 

Signature of Baba Saheb

15 वर्ष की आयु में 9 वर्ष की रमाबाई से उनका विवाह हो गया लेकिन यह शादी उनकी प्रतिभा पर भारी नहीं पड़ी । शादी के बाद मुंबई के एलकिंग्सटन कॉलेज में दाखिला ले लिया । उन्हें ₹25 प्रति माह का स्कॉलरशिप भी मिलने लगा । 1912 में उन्होंने राजनीति विज्ञान एवं अर्थशास्त्र में स्नातक की उपाधि ली और फिर अमेरिका चले गए ।

बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर जी  ने न सिर्फ दलित और पिछड़ों के  लिए बल्कि  महिलाओं के अधिकार के लिए भी संघर्ष किया हैं । हर कोई  आज महिला सशक्तिकरण का श्रेय लूटने में लगा हैं परंतु हकीकत में भारत में इस बदलाव के असल नायक डॉ भीमराव अम्बेडकर जी हैं जिन्होंने सभी को एक समान रखा 

1916 में उन्हें शोध करने के लिए पीएचडी से सम्मानित किया गया । 1930 में उन्होंने अपना एक और शोध "रुपए की समस्याएं" को पूरा किया और इसके लिए भी उन्हें लंदन यूनिवर्सिटी से डॉक्टर ऑफ साइंस का उपाधि मिली । 1927 में कोलंबिया यूनिवर्सिटी ने उन्हें पीएचडी की उपाधि दी। 

यहीं से शुरू हुआ दलितों के लिए समान अधिकार का प्रचार प्रसार


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जीवन के इस आपाधापी में अंबेडकर आगे तो बढ़ रहे थे लेकिन जिस असमानता का वह सामना कर रहे थे वह उन्हें कचोट रहा था। इसलिए उन्होंने देश भर में घूम-घूम कर दलितों के अधिकार के लिए आवाज उठाए । लोगों को जागरुक करने के के लिए एक समाचार पत्र जिसका नाम "मूकनायक" मतलब की साइलेंट हीरो था जिसे उन्होंनेे शुरू किया । 

सन 1936 में भीमराव अंबेडकर ने स्वतंत्र मजदूर पार्टी की स्थापना की  और अगले ही साल केंद्रीय विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी को 15 सीटें मिली । बाद में इसका नाम बदलकर ऑल इंडिया शेड्यूल कास्ट पार्टी (All India Schedule cast) कर दिया गया । सुरक्षा सलाहकार समिति और वायसराय के कार्यकारिणी परिषद के श्रम मंत्री के रूप में कार्यरत रहे । देश के पहले कानून मंत्री बने और संविधाान के गठन केे अध्यक्ष रहे । 

बाबा साहेब की पहली पसंद कानून नहीं था

बाबासाहेब आंबेडकर की खास बात यह थी कि यह कानून से ज्यादा समाज को मानते थे । उनका कहना था जब तक आप सामाजिक रूप से स्वतंत्र नहीं हो जाते जब तक समाज खुद आपको इज्जत नहींं देता तब तक कानून कुछ नहींं कर सकता । वे कहते थे कि एक सफल क्रांति केवल असंतोष का होना ही काफी नहीं है बल्कि इसके लिए न्याय, राजनीति और सामाजिक अधिकारों में गहरी आस्था का होना भी बहुत ही आवश्यक है ।

पहली बार बाबासाहेब को बौद्ध धर्म से लगाव कैसे हुआ ?

Courtesy:religiousworld.in


ऐसे ही एक और किस्सा है जो बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपना लिया था । दरअसल अंबेडकर बचपन से ही संस्कारी और धार्मिक माहौल में रहे थे । उनका कहना था कि मैं ऐसे धर्म में विश्वास रखता हूं जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा सिखाएं । साथ ही 1950 में उनकी एक बौद्धिक सम्मेलन में भाग लेने के लिए श्री लंका गए जहां उन्हें बौद्ध धर्म से लगाव सा हो गया। 

भारत में आकर उन्होंने इस पर किताब भी लिखा और बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया । 1955 में उन्होंने भारतीय बौद्ध महासभा की स्थापना की । 14 अक्टूबर 1956 को उन्होंने एक सभा में 5 लाख लोगों के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया । 

वेटिंग फॉर वीजा (Waiting for Visa)

आत्मकथा वेटिंग फॉर वीजा (Waiting for Visa) में बाबासाहेब ने एक घटना का जिक्र किया था उन्होंने बिना नाम लिखे बताया था एक दलित जिसे अछूत माना जाता था उसका बच्चा बीमार हो गया जब उस बच्चे का पिता डॉक्टर के पास गया तो डॉक्टर ने आने से मना कर दिया क्योंकि वह लोग दलित थे ।

फिर बच्चे के पिता नगर सेठ के पास गए, नगर सेठ ने ₹2 देने का वादा किया तो डॉक्टर इस बार इस शर्त पर मान गया कि अगर बच्चा दलित बस्ती से बाहर आता है तो उसका इलाज करेगा इस शर्त के अनुसार बच्चे के माता-पिता रात को 8:00 बजे अपने बच्चे को लेकर दलित बस्ती से बाहर आए तब जाकर डॉक्टर ने बच्चे का इलाज किया और कुछ दवाएं भिजवाई । 

लेकिन बाद में दोबारा आने से मना कर दिया और इस तरह बच्चे की जान चली गई इस घटना से बाबा साहब भीमराव अंबेडकर बहुत ही दुखी हुए और अपना पूरा जीवन समानता के अधिकार के लिए संघर्ष करते हुए बीता दिए ।


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