अंतरराष्ट्रीय महिला जननांग विकृति (FGM) के प्रति शून्य सहिष्णुता दिवस (International Day of Zero Tolerance for Female Genital Mutilation) तिथि: 6 फरवरी
FGM क्या है?
FGM वह प्रक्रिया है जिसमें बिना किसी चिकित्सीय आवश्यकता के लड़कियों या महिलाओं के बाहरी जननांगों को आंशिक या पूर्ण रूप से काट दिया जाता है या उन्हें स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त किया जाता है। यह प्रथा अक्सर बचपन या किशोरावस्था में कराई जाती है। कई समुदायों में इसे परंपरा, सामाजिक स्वीकृति, विवाह योग्यता या तथाकथित “पवित्रता” से जोड़कर देखा जाता है, जबकि वास्तविकता में यह महिलाओं के शरीर और सम्मान पर सीधा आघात है।
स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव
FGM के कोई चिकित्सीय लाभ नहीं होते, बल्कि इसके गंभीर और दीर्घकालिक दुष्परिणाम होते हैं। इस प्रक्रिया से गुजरने वाली बालिकाओं और महिलाओं को असहनीय दर्द, अत्यधिक रक्तस्राव, संक्रमण, पेशाब व मासिक धर्म में कठिनाई जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। आगे चलकर गर्भावस्था और प्रसव के समय जटिलताएँ बढ़ जाती हैं। मानसिक रूप से भी पीड़ित महिलाओं को भय, अवसाद, आघात (Trauma) और आत्मसम्मान में कमी जैसी समस्याएँ झेलनी पड़ती हैं।
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मानवाधिकारों का उल्लंघन
FGM केवल स्वास्थ्य समस्या नहीं, बल्कि यह महिलाओं के मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। यह उनके शरीर पर अधिकार (Bodily Autonomy), गरिमा, सुरक्षा और स्वतंत्र जीवन के अधिकार को छीन लेता है। किसी भी परंपरा या सामाजिक दबाव के नाम पर हिंसा को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
वैश्विक स्थिति
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया भर में 20 करोड़ से अधिक महिलाएँ और लड़कियाँ FGM का शिकार हो चुकी हैं। यह प्रथा मुख्य रूप से अफ्रीका, मध्य-पूर्व और कुछ एशियाई क्षेत्रों में पाई जाती रही है, लेकिन प्रवास और सांस्कृतिक प्रसार के कारण अब यह वैश्विक चिंता का विषय बन चुकी है। हर वर्ष लाखों बालिकाएँ इसके जोखिम में रहती हैं।
अंतरराष्ट्रीय प्रयास
FGM को समाप्त करने के लिए संयुक्त राष्ट्र, WHO, UNICEF और UNFPA जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन लगातार प्रयासरत हैं। जागरूकता अभियान, सामुदायिक संवाद, शिक्षा कार्यक्रम और कानूनी प्रतिबंधों के माध्यम से इस कुप्रथा को जड़ से खत्म करने का लक्ष्य रखा गया है। सतत विकास लक्ष्य (SDG-5: Gender Equality) के अंतर्गत वर्ष 2030 तक FGM उन्मूलन का वैश्विक संकल्प लिया गया है।
समाज की जिम्मेदारी
कानून अपने स्थान पर महत्वपूर्ण है, लेकिन सामाजिक सोच में बदलाव सबसे अधिक आवश्यक है। शिक्षा, जागरूकता, महिलाओं के स्वास्थ्य अधिकारों पर खुली चर्चा, पीड़ितों को चिकित्सा व मानसिक सहयोग, तथा समुदाय और धार्मिक नेताओं की भागीदारी — ये सभी कदम मिलकर इस प्रथा को समाप्त कर सकते हैं। हर परिवार और समाज का दायित्व है कि वह बालिकाओं की सुरक्षा और सम्मान को प्राथमिकता दे।
अंतरराष्ट्रीय महिला जननांग विकृति के प्रति शून्य सहिष्णुता दिवस हमें यह संदेश देता है कि किसी भी परंपरा से ऊपर मानवता है। हर लड़की को सुरक्षित बचपन, सम्मानजनक जीवन और अपने शरीर पर पूर्ण अधिकार मिलना चाहिए।

